30 जुलाई से शुरू होगा सावन, शिवालयों में गूंजेगा ‘हर-हर महादेव’; त्याग, सेवा और प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है श्रावण
रांची: भगवान शिव की आराधना, तप और भक्ति का पावन महीना श्रावण (सावन) इस वर्ष 30 जुलाई से प्रारंभ होकर 28 अगस्त तक रहेगा। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि सावन केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि त्याग, करुणा, समभाव, लोककल्याण और प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला पवित्र महीना है।
उन्होंने बताया कि सनातन धर्म में सावन को भगवान शिव का सबसे प्रिय महीना माना जाता है। पूरे माह श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और आक-पुष्प अर्पित कर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। विशेष रूप से सावन के सोमवार का अत्यधिक महत्व है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर जलाभिषेक करते हैं और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप कर सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना करते हैं।
समुद्र मंथन से जुड़ी है सावन की महिमा
संजय सर्राफ ने बताया कि सावन की महिमा का संबंध समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष की उष्णता को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर जल अर्पित किया। इसी कारण सावन में जलाभिषेक की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
प्रकृति और सेवा का भी है संदेश
उन्होंने कहा कि सावन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। वर्षा ऋतु में प्रकृति नई ऊर्जा से भर जाती है और चारों ओर हरियाली फैल जाती है। ऐसे समय में भगवान शिव की आराधना मनुष्य को प्रकृति संरक्षण, संयम, सेवा, सदाचार और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देती है।
सात्त्विक जीवन अपनाने की प्रेरणा
संजय सर्राफ ने कहा कि श्रावण मास में श्रद्धालुओं को सात्त्विक जीवन, मधुर वाणी, जरूरतमंदों की सेवा, गौसेवा, पर्यावरण संरक्षण और परोपकार को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। भगवान शिव का स्वरूप त्याग, करुणा, समभाव और लोककल्याण का प्रतीक है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से सावन माह में श्रद्धा, अनुशासन और सेवा भाव के साथ भगवान शिव की आराधना करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि सावन का वास्तविक संदेश मानव कल्याण, सामाजिक सद्भाव और प्रकृति के संरक्षण में निहित है। ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंजते शिवालय और श्रद्धापूर्वक किए गए जलाभिषेक इसी भावना को और अधिक मजबूत करते हैं।
