नामकुम जमीन मामले में जांच की अनुमति में देरी पर हाईकोर्ट सख्त
कैबिनेट सचिव को एक सप्ताह में निर्णय लेने का निर्देश, 17 जुलाई को अगली सुनवाई
रांची। रांची के नामकुम अंचल में जमीन की खरीद-बिक्री, दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) में कथित अनियमितताओं और राजस्व अभिलेखों के गायब होने के मामले में प्रारंभिक जांच (पीई) की अनुमति लंबित रहने पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति राजेश शंकर की अदालत ने कैबिनेट सचिव को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को प्रारंभिक जांच की अनुमति देने के संबंध में निर्णय लें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि तय समय में निर्णय नहीं लिया गया तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा।
शपथ-पत्र दाखिल करने का भी आदेश
अदालत ने कैबिनेट सचिव को इस संबंध में शपथ-पत्र दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई निर्धारित की है। सुनवाई के दौरान एसीबी की ओर से वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया और याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जे.जे. सांगा ने पक्ष रखा।
‘अनुमति में देरी का कोई औचित्य नहीं’
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि एसीबी ने प्रारंभिक जांच की अनुमति के लिए कैबिनेट सतर्कता विभाग को प्रस्ताव भेजा था, जहां से इसे अनुमोदन के लिए राजस्व विभाग भेजा गया है। इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि नामकुम अंचल कार्यालय से सरकारी फाइलों और राजस्व अभिलेखों के गायब होने का मामला प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के दायरे में नहीं आता। इसलिए जांच की अनुमति देने में अनावश्यक विलंब उचित नहीं है।
म्यूटेशन में अनियमितता और रिकॉर्ड गायब होने का आरोप
मामला डुंडु क्षेत्र की विवादित भूमि के म्यूटेशन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता थॉमस साइमन ने आरोप लगाया है कि दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं और जांच की मांग के बावजूद मूल राजस्व अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए। अदालत ने पूर्व सुनवाई में यह भी पाया था कि अंचल कार्यालय न्यायालय के आदेश के बावजूद म्यूटेशन की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने में टालमटोल कर रहा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने जांच की जिम्मेदारी एसीबी को सौंपी है। अब सरकार की अनुमति और एसीबी की आगे की कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
