रांची

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का 81 वर्ष की उम्र में निधन, राज्यभर में शोक की लहर

रांची, 4 अगस्त । झारखंड आंदोलन के जनक और राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके वरिष्ठ राजनेता शिबू सोरेन का शनिवार को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। 81 वर्षीय शिबू सोरेन पिछले कई वर्षों से बीमार चल रहे थे और हाल के दिनों में उनकी तबीयत और अधिक बिगड़ गई थी। उनके निधन की पुष्टि उनके बेटे और झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने की है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर गहरे दुख के साथ लिखा, “आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं।” इस मार्मिक संदेश के साथ उन्होंने पिता के प्रति अपनी भावनाएं साझा कीं। मुख्यमंत्री की इस पोस्ट के बाद से ही सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलियों की बाढ़ आ गई है।

आदिवासी समाज की राजनीति में सबसे बड़ा चेहरा रहे

शिबू सोरेन, जिन्हें झारखंड में ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना जाता है, राज्य के आदिवासी समाज के लिए एक आइकॉनिक नेता थे। उन्होंने लंबे समय तक आदिवासी अधिकारों, भूमि बचाओ आंदोलन और झारखंड राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक अध्यक्ष थे और 1970 के दशक से ही राज्य के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में एक प्रमुख चेहरा रहे।

वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने—पहली बार 2005 में, फिर 2008 में और आखिरी बार 2009 में। इसके अलावा, वे केंद्र सरकार में कोयला मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। उनका पूरा राजनीतिक जीवन जन अधिकारों और आदिवासी सशक्तिकरण को समर्पित रहा।

राज्यभर में शोक की लहर

शिबू सोरेन के निधन की खबर से झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई है। राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने शोक व्यक्त करते हुए उन्हें झारखंड की आत्मा बताया है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर शोकाकुल माहौल है। जल्द ही उनके पार्थिव शरीर को रांची लाया जाएगा, जहां राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। सरकार ने राज्य में दो दिन का राजकीय शोक घोषित कर दिया है।

झारखंड के लिए एक युग का अंत

शिबू सोरेन का निधन केवल एक राजनेता की मौत नहीं है, बल्कि यह झारखंड के एक युग का अंत है। वे उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिनकी पहचान सत्ता से नहीं, संघर्ष से बनी थी। झारखंड को अलग राज्य बनाने के पीछे उनका योगदान इतिहास में अमिट रहेगा।

राज्य और देश ने आज एक प्रखर जननेता, संघर्षशील व्यक्तित्व और आदिवासी अस्मिता के प्रतीक को खो दिया है। उन्हें झारखंड के इतिहास में हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *