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बाबा बैद्यनाथ धाम जाने के पांच दशक पूरे, बांस से की थी कांवरयात्रा की शुरूआत

पलामू, 24 अगस्त (हि.स.)। कहते हैं कि सच्ची आस्था के सामने गरीबी, उम्र, बीमारी और कठिन से कठिन परिस्थितियां भी छोटी पड़ जाती हैं। जब मन में बाबा का नाम हो तो रास्ते की मुश्किलें भी भक्ति के आगे हार जाती हैं। ऐसी ही अटूट आस्था की कहानी है पलामू जिले के लेस्लीगंज प्रखंड के ढेला गांव निवासी अजीत सिन्हा की, जिनकी बाबा बैद्यनाथ के प्रति श्रद्धा को पांच दशक पूरे होने जा रहे हैं।

वर्ष 1977 में महज 22 वर्ष की उम्र में अजीत सिन्हा ने पहली बार बाबा नगरी देवघर जाने का संकल्प लिया था। उस समय उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। जेब में सिर्फ 80 रुपये थे और कांवर खरीदने तक के पैसे नहीं थे। लेकिन बाबा के दर्शन और जलाभिषेक की इच्छा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने घर में उपलब्ध बांस से खुद कांवर तैयार की और उसी कांवर को कंधे पर रखकर देवघर की राह पकड़ ली।

उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि 80 रुपये और बांस की साधारण कांवर से शुरू हुआ यह सफर एक दिन उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी आस्था और पहचान बन जाएगा। दोस्तों ने भी उनका साथ दिया। पहली यात्रा के बाद बाबा के प्रति उनकी श्रद्धा लगातार गहरी होती गई और हर सावन उन्हें बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक खींच ले गया।

अजीत सिन्हा की बाबा नगरी यात्रा से जुड़ी कई यादें हैं, लेकिन एक घटना आज भी उन्हें भावुक कर देती है। उन्होंने बताया कि एक बार देवघर में यात्रा के दौरान वह आराम कर रहे थे। इसी दौरान एक नंदी उनके प्लास्टिक के पास आकर बैठ गया।

आसपास ढोल-नगाड़े बज रहे थे। श्रद्धालु फल-फूल और तरह-तरह के प्रसाद लेकर नंदी को खिला रहे थे, लेकिन उसने किसी का प्रसाद ग्रहण नहीं किया। अजीत सिन्हा के पास भी कोई महंगा प्रसाद नहीं था। उनके झोले में केवल नीमकी और खजूर थे।

उन्होंने श्रद्धा से वही नीमकी और खजूर निकालकर प्लेट में नंदी महराज के सामने रख दिए। उनके अनुसार, नंदी ने उनका प्रसाद ग्रहण कर लिया। यह दृश्य देखकर अजीत सिन्हा की आंखों में खुशी और भक्ति के आंसू छलक पड़े। ढोल-नगाड़ों के बीच वह भावुक होकर झूम उठे।

कुछ देर बाद नंदी वहां से चला गया और फिर दिखाई नहीं दिया। अजीत सिन्हा के लिए यह महज एक घटना नहीं, बल्कि बाबा की कृपा का संकेत बन गई। वह आज भी उस पल को अपनी जिंदगी की सबसे अनमोल आध्यात्मिक स्मृतियों में से एक मानते हैं।

बाबा बैद्यनाथ से जुड़ी एक और घटना को याद करते हुए अजीत सिन्हा बताते हैं कि एक बार वह अपनी पत्नी उर्मिला सिन्हा के अलावा अपने चार बच्चों के साथ देवघर गए थे। भारी भीड़ में उनकी पत्नी उनसे बिछड़ गईं। काफी खोजबीन के बाद वह उन्हें एक जगह भगवान शिव की प्रतिमा देखते हुए मिली।

अजीत सिन्हा ने जब पत्नी से पूछा कि वह प्रतिमा क्यों देख रही हैं, तो उन्होंने कहा कि इसे इसलिए लेंगी कि जब अजीत 407 वाहन खरीदेंगे तो उसमें भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करेंगी। उस समय 407 वाहन खरीदना उनके लिए किसी सपने से कम नहीं था। लेकिन अजीत सिन्हा कहते हैं कि समय बदला और बाबा की कृपा से उन्होंने 407 वाहन खरीदा। इसके बाद पत्नी की इच्छा के अनुसार उसमें भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की। वह इस घटना को भी बाबा के आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं।

पांच दशक के इस सफर में अजीत सिन्हा ने गरीबी, आर्थिक तंगी और जिंदगी की कई परेशानियां देखीं। कई बार परिस्थितियां ऐसी बनीं कि देवघर जाना मुश्किल लगा, लेकिन बाबा के दरबार तक पहुंचने की उनकी इच्छा कभी कमजोर नहीं हुई।

आज उम्र बढ़ने के साथ शरीर भी पहले जैसा साथ नहीं देता। शरीर में दर्द और कई तरह की शारीरिक परेशानियां हैं। इसी सावन में उनका एक्सीडेंट भी हुआ, जिसके बाद तकलीफ और बढ़ गई। इसके बावजूद बाबा के प्रति उनकी आस्था में कोई कमी नहीं आई।

वह भावुक होकर कहते हैं, “शरीर अब साथ नहीं देता, लेकिन बाबा के दरबार में जाने की इच्छा आज भी पहले जैसी है। जब तक सांस है, बाबा का नाम और बाबा के दर्शन की इच्छा दिल में रहेगी।”

अजीत सिन्हा की पांच दशक लंबी बाबा भक्ति और लगातार देवघर यात्रा को देखते हुए सनातन धर्म सभा की ओर से सोमवार को उन्हें सम्मानित किया गया। सभा के सदस्यों ने उन्हें बाबा नगरी की 50वीं यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं और सम्मानपूर्वक विदा किया।

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