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दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान

आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और सामाजिक न्याय के संघर्ष को मिला राष्ट्रीय सम्मान

रांची/नई दिल्ली, 23 जून। झारखंड आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार, आदिवासी अस्मिता के प्रतीक और जननायक दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित गरिमामय समारोह में उनकी पत्नी श्रीमती रूपी सोरेन ने यह सम्मान ग्रहण किया।

यह सम्मान शिबू सोरेन के दशकों लंबे सामाजिक, राजनीतिक और जनाधिकारों के संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर मिली महत्वपूर्ण मान्यता माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवनकाल में आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा तथा सामाजिक न्याय के लिए निरंतर संघर्ष किया और झारखंड आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।

झारखंड आंदोलन के प्रमुख नायक रहे शिबू सोरेन

शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य गठन के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व और संघर्ष ने न केवल झारखंड की पहचान को मजबूत किया, बल्कि देशभर में वंचित एवं आदिवासी समुदायों के अधिकारों की आवाज को भी बुलंद किया।

उनके योगदान को याद करते हुए विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने इसे झारखंड के लिए गौरव का क्षण बताया है।

सम्मान ग्रहण करते समय भावुक हुईं रूपी सोरेन

राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में सम्मान ग्रहण करने के दौरान श्रीमती रूपी सोरेन भावुक नजर आईं। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल शिबू सोरेन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड और आदिवासी समाज के लिए गर्व और सम्मान का विषय है।

उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु का जीवन संघर्ष, समर्पण और जनसेवा का प्रतीक रहा है तथा उनके आदर्श आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।

कल्पना सोरेन भी रहीं उपस्थित

सम्मान समारोह में गांडेय विधायक श्रीमती कल्पना सोरेन भी उपस्थित थीं। इस अवसर पर देशभर के राजनीतिक एवं सामाजिक नेताओं ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेगा सम्मान

झारखंड के जननायक को मिला यह राष्ट्रीय सम्मान उनके संघर्षमय जीवन, सामाजिक सरोकारों और जनहित के प्रति समर्पण को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनेगा। पद्म भूषण सम्मान से न केवल शिबू सोरेन के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है, बल्कि झारखंड की गौरवशाली संघर्ष परंपरा को भी नई पहचान मिली है।

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