देवशयनी एकादशी: भगवान विष्णु योगनिद्रा में होंगे विराजमान, चातुर्मास का होगा शुभारंभ
आत्मचिंतन, संयम और साधना का पावन पर्व है देवशयनी एकादशी : संजय सर्राफ
रांची: विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि देवशयनी एकादशी, जिसे हरिशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी अथवा पद्मा एकादशी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक है। इस वर्ष यह पावन पर्व 25 जुलाई (शनिवार) को मनाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी पर भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार माह की योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जो देवउठनी एकादशी तक चलता है। इस अवधि में विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः स्थगित रहते हैं तथा जप, तप, व्रत, दान, सेवा और सत्संग जैसे आध्यात्मिक कार्यों का विशेष महत्व माना जाता है।
व्रत, पूजा और सेवा से मिलता है पुण्य
संजय सर्राफ ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने, भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने तथा जरूरतमंदों की सेवा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन श्रद्धालु पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप एवं नैवेद्य अर्पित कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं तथा विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता और विष्णु मंत्रों का जप करते हैं।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है विशेष महत्व
उन्होंने बताया कि पद्म पुराण, स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व वर्णित है। इन ग्रंथों के अनुसार यह व्रत पापों का नाश करने वाला, मन को पवित्र बनाने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। कई स्थानों पर इस अवसर पर भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का भी आयोजन किया जाता है।
सादगी, सेवा और प्रकृति संरक्षण का संदेश
संजय सर्राफ ने कहा कि देवशयनी एकादशी केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सदाचार, करुणा और सेवा का संदेश भी देती है। चातुर्मास के दौरान व्यक्ति अपने जीवन में सादगी, अनुशासन और आध्यात्मिक साधना अपनाने का संकल्प लेता है। यह पर्व प्रकृति संरक्षण, जीवों के प्रति दया, सात्विक जीवनशैली और सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है।
भौतिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक विकास भी जरूरी
उन्होंने कहा कि आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में देवशयनी एकादशी आत्मचिंतन, संयम और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा का संदेश देती है। श्रद्धा, भक्ति और सेवा के माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने जीवन को सार्थक बना सकता है, बल्कि समाज में प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का भी प्रसार कर सकता है।
