10 जुलाई को मनाई जाएगी योगिनी एकादशी, आत्मशुद्धि और मोक्ष का पावन पर्व
सदाचार, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देती है योगिनी एकादशी : संजय सर्राफ
रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय सनातन संस्कृति में एकादशी व्रतों का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी इस वर्ष 10 जुलाई को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। यह व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित है तथा इसे पापों के नाश, आत्मशुद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाला श्रेष्ठ व्रत माना गया है।
संजय सर्राफ ने बताया कि ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं पद्म पुराण में योगिनी एकादशी का विस्तृत उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि कुबेर के पुष्पमाली हेममाली की कथा इस एकादशी के महत्व को दर्शाती है। कर्तव्य की उपेक्षा के कारण श्रापित हेममाली ने ऋषि मार्कण्डेय के निर्देश पर योगिनी एकादशी का व्रत किया और श्राप से मुक्त होकर पुनः स्वस्थ एवं सम्मानित जीवन प्राप्त किया। यह कथा कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा का संदेश देती है।
पूजा, व्रत और सेवा से मिलता है आध्यात्मिक लाभ
उन्होंने कहा कि योगिनी एकादशी का उद्देश्य मनुष्य को बुरे कर्मों से दूर कर सदाचार, संयम, सेवा और आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करना है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं, विष्णु सहस्रनाम एवं श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करते हैं तथा रात्रि में भजन-कीर्तन के माध्यम से भगवान का स्मरण करते हैं। द्वादशी तिथि को विधि-विधान के साथ व्रत का पारण किया जाता है।
संजय सर्राफ ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक किया गया यह व्रत अनेक यज्ञों और दानों के समान पुण्यफल प्रदान करता है। इसके साथ ही दीन-दुखियों की सेवा, अन्न, वस्त्र और जल का दान तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे सत्कर्मों का भी विशेष महत्व बताया गया है।
उन्होंने कहा कि आज के भौतिकवादी दौर में योगिनी एकादशी का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह पर्व आत्मसंयम, नैतिकता, सेवा, करुणा और ईश्वर के प्रति आस्था का संदेश देता है। यदि इसके आदर्शों को जीवन में अपनाया जाए तो व्यक्ति के साथ-साथ समाज में भी सद्भाव, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विस्तार संभव है।
