रांची मेयर चुनाव में सियासी ड्रामा, अपने ही नेता बने पार्टियों के लिए चुनौती
रांची : नगर निगम चुनाव भले ही कागजों में गैर-दलीय घोषित हो, लेकिन जमीनी हकीकत पूरी तरह राजनीतिक हो चुकी है। प्रमुख राजनीतिक दल बीजेपी, कांग्रेस और झामुमो (JMM) अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक चुके हैं। कांग्रेस की प्रत्याशी रमा खलखो को महागठबंधन का खुला समर्थन मिलने से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है, वहीं झामुमो और बीजेपी में बगावत ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं।
JMM में खुलकर सामने आई बगावत
झामुमो ने भले आधिकारिक तौर पर कोई उम्मीदवार घोषित नहीं किया हो, लेकिन पार्टी के अंदर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। मेयर पद के लिए पार्टी से जुड़े छह नेताओं ने नामांकन दाखिल कर दिया है। इनमें वीरू तिर्की, रामशरण तिर्की, अजीत लकड़ा, सुजीत कुमार कुजूर और सुजीत विजय आनंद कुजूर प्रमुख हैं। इन नेताओं के चुनाव मैदान में उतरने से पार्टी के अंदर असंतोष की स्थिति साफ दिखाई दे रही है।
बीजेपी में भी अंदरूनी घमासान तेज
बीजेपी में भी स्थिति अलग नहीं है। पार्टी समर्थित उम्मीदवार के बावजूद कई नेता स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में उतर गए हैं। इनमें एसटी मोर्चा के मीडिया प्रभारी राजेंद्र मुंडा, पूर्व पार्षद सुजाता कच्छप, सुनील फकीरा कच्छप और संजय कुमार टोप्पो शामिल हैं। इन नेताओं का कहना है कि चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं हो रहा है, इसलिए वे स्वतंत्र रूप से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पार्टी के अंदर असंतोष का संकेत है।
चुनाव बना समर्थन बनाम बगावत की जंग
बागी नेताओं के मैदान में उतरने से मेयर चुनाव के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। अब यह चुनाव केवल उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच शक्ति परीक्षण बन गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी उम्मीदवार वोटों का गणित बिगाड़ सकते हैं और इसका सीधा असर मुख्य उम्मीदवारों के परिणाम पर पड़ सकता है।
स्पष्ट है कि रांची का मेयर चुनाव अब सीधी लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह समर्थन बनाम बगावत और संगठन बनाम असंतोष की बड़ी राजनीतिक जंग बन चुका है।
