चतरा

लेंबोईया पहाड़ी पर विराजतीं मां दक्षिणेश्वरी भगवती, आस्था और प्राचीन विरासत का अनूठा संगम है यह सिद्धपीठ

-नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु, मनोकामना पूरी होने पर सोने-चांदी के नेत्र चढ़ाने की परंपरा-कार्तिक पूर्णिमा का मेला और प्राचीन प्रतिमाएं बढ़ाती हैं मंदिर की विशिष्टता-मां चामुंडा के वाम नेत्र से जुड़ी है मान्यता, सदियों पुराना है मंदिर का इतिहास

चतरा, 19 अक्टूबर । झारखंड के चतरा जिले के पत्थलगडा प्रखंड में स्थित लेंबोईया पहाड़ी की चोटी पर विराजमान मां दक्षिणेश्वरी भगवती का मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरी पहाड़ी पर स्थित इस सिद्धपीठ की ख्याति झारखंड के अलावा आसपास के राज्यों तक फैली हुई है। नवरात्र के अवसर पर यहां मां के दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से मां के दरबार में पहुंचने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन प्रतिमाओं, पारंपरिक पूजा-पद्धतियों और ऐतिहासिक विरासत को समेटे लेंबोईया मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं आज भी लोगों को मंदिर से जोड़ती हैं।

मां सती के वाम नेत्र से जुड़ी है मान्यता

स्थानीय मान्यता के अनुसार, लेंबोईया पहाड़ी पर मां सती का वाम नेत्र गिरा था। इसी वजह से इस स्थल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। मंदिर में मां भगवती चामुंडा स्वरूप में विराजमान हैं और उनकी प्रतिमा दक्षिणमुखी है। श्रद्धालु इसे दुर्लभ और कल्याणकारी मानते हैं।

मंदिर से जुड़ी कई लोकमान्यताएं यहां की धार्मिक परंपराओं को विशिष्ट बनाती हैं। भक्तों का विश्वास है कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। यही आस्था नवरात्र समेत वर्षभर श्रद्धालुओं को यहां खींच लाती है।

मनोकामना पूरी होने पर चढ़ाते हैं सोने-चांदी के नेत्र

लेंबोईया मंदिर की प्रमुख परंपराओं में मनोकामना पूरी होने पर मां को सोने और चांदी के नेत्र अर्पित करना शामिल है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माता को नेत्र चढ़ाते हैं। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान बन गई है।

मंदिर में पूजा की एक और अनूठी विधि प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, पुजारी मां भगवती के मस्तक पर फूल अर्पित कर स्तुति करते हैं। श्रद्धालु फूल गिरने की प्रतीक्षा करते हैं। लोकविश्वास है कि मां के मस्तक पर चढ़ाया गया फूल जितनी जल्दी गिरता है, मनोकामना उतनी ही जल्द पूरी होती है। फूल गिरने को मां की कृपा और मनोकामना पूर्ण होने का शुभ संकेत माना जाता है। यह परंपरा प्रतिदिन निभाई जाती है।

नवमी के मेले से कार्तिक पूर्णिमा तक का सफर

लेंबोईया मंदिर का मेला भी क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का अहम हिस्सा है। क्षेत्र के बुजुर्गों, पूर्व मुखिया बासुदेव तिवारी, गंदौरी राम दांगी और तीर्थनाथ दांगी सहित अन्य ग्रामीणों के अनुसार, करीब 50 वर्ष पहले तक नवरात्र की नवमी के दिन मंदिर परिसर में विशाल मेले का आयोजन होता था। बाद में पत्थलगडा प्रखंड मुख्यालय में दुर्गापूजा का आयोजन शुरू होने के बाद नवमी के मेले की परंपरा बंद हो गई। इसके बाद कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मेले का आयोजन शुरू हुआ। आज भी यह मेला श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था के साथ मेल-मिलाप और सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर है।

प्राचीन प्रतिमाएं बयां करती हैं इतिहास

मंदिर परिसर में मां भगवती की प्रतिमा के अलावा कई प्राचीन प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। स्थानीय विवरणों में इन प्रतिमाओं का संबंध पाल काल से बताया जाता है। मंदिर की प्राचीनता और यहां मौजूद प्रतिमाएं इस स्थल के पुरातात्विक महत्व की ओर संकेत करती हैं।

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मुगल काल में इस प्राचीन मंदिर को भी नुकसान पहुंचा गया था। मान्यता है कि मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में उसके सेनापति दाऊद खान की ओर से कुंदा किला, कोठी किला और पलामू किले पर हमलों तथा तोड़फोड़ की घटनाओं के दौरान कई धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था। इसी दौर में लेंबोईया पहाड़ी स्थित मंदिर को नुकसान पहुंचने की बात भी कही जाती है। इन ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि आवश्यक है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1872 के सर्वेक्षण नक्शे में भी मंदिर का उल्लेख मिलता है। यह जानकारी मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। मंदिर का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और प्राचीन प्रतिमाओं का संरक्षण इसकी विरासत को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकता है।

रामगढ़ राजपरिवार से रहा है पुराना जुड़ाव

मंदिर के वयोवृद्ध पुजारी भोली पांडेय के अनुसार, लेंबोईया मंदिर का रामगढ़ राजपरिवार से पुराना संबंध रहा है। उनके मुताबिक, रामगढ़ राजपरिवार के राजा कामाख्या नारायण सिंह पहले मंदिर पहुंचकर यहां की व्यवस्था का जायजा लेते थे। पुजारी ने बताया कि मंदिर के पुजारी के रहन-सहन और व्यवस्था के लिए राजपरिवार की ओर से जमीन दान में दी गई थी। यह जमीन सिंघानी और लेंबोईया गांव के मौजा में स्थित है। मंदिर में राजपरिवार से जुड़ी कुछ धार्मिक रस्मों और चढ़ावे की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, प्रथम बलि का आह्वान आज भी राजपरिवार के नाम से किया जाता है।

भूमिहार परिवारों की कुलदेवी हैं मां भगवती

लेंबोईया मंदिर का स्थानीय समाज के जीवन में भी विशेष स्थान है। क्षेत्र के भूमिहार परिवार मां भगवती को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले मंदिर पहुंचकर माता के समक्ष शीश नवाने की परंपरा प्रचलित है। मुंडन, उपनयन और विवाह जैसे मांगलिक संस्कारों के अवसर पर भी श्रद्धालु मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। इस कारण मंदिर में सालभर भक्तों की आवाजाही बनी रहती है। धार्मिक अनुष्ठानों और पारिवारिक परंपराओं के माध्यम से मंदिर पीढ़ियों से लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है।

आषाढ़ में दूध चढ़ाने की अनूठी परंपरा

मंदिर से जुड़ी एक अन्य विशिष्ट परंपरा आषाढ़ महीने में निभाई जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, सिंघानी गांव के किसान इस दौरान मां भगवती के दरबार में दूध चढ़ाते हैं। मान्यता है कि निर्धारित बर्तन में चढ़ाया गया दूध यदि बराबर मात्रा में निकलता है, तो उस वर्ष अच्छी कृषि पैदावार होती है। यह परंपरा किसानों की आस्था और कृषि जीवन के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है। प्रकृति, खेती और धार्मिक विश्वासों का यह मेल लेंबोईया मंदिर को क्षेत्र की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।

पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है लेंबोईया पहाड़ी

लेंबोईया पहाड़ी पर स्थित मां भगवती का मंदिर धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत का भी संगम है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने इस स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में चिह्नित किया है। यहां मौजूद प्राचीन प्रतिमाएं, ऐतिहासिक मान्यताएं, विशिष्ट पूजा-पद्धतियां और कार्तिक पूर्णिमा का मेला इसे विशेष पहचान देते हैं।

मंदिर के ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण, प्राचीन प्रतिमाओं के संरक्षण और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाओं के विस्तार से इस स्थल की पहचान व्यापक हो सकती है। बेहतर बुनियादी सुविधाएं विकसित होने पर धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय लोगों के लिए भी अवसर पैदा हो सकते हैं।

लेंबोईया मंदिर की खासियत इसकी प्राचीनता भर नहीं है, बल्कि वे परंपराएं भी हैं जो आज तक जीवित हैं। मनोकामना पूरी होने पर नेत्र अर्पित करना, फूल गिरने को मां की कृपा का संकेत मानना, आषाढ़ में दूध चढ़ाना और कार्तिक पूर्णिमा के मेले में जुटना जैसी परंपराएं इस सिद्धपीठ को चतरा की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का विशिष्ट प्रतीक बनाती हैं।

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