21 मार्च को मनाया जाएगा गणगौर पर्व, नारी शक्ति और दांपत्य प्रेम का प्रतीक : संजय सर्राफ
रांची: Jharkhand Provincial Marwari Sammelan के प्रांतीय संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता के प्रतीक होते हैं। उन्होंने बताया कि प्रमुख पर्वों में शामिल गणगौर इस वर्ष 21 मार्च (शनिवार) को मनाया जाएगा, जो विशेष रूप से राजस्थान और मारवाड़ी समाज में बड़े श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
संजय सर्राफ ने बताया कि गणगौर पर्व Lord Shiva (गण) और Goddess Parvati (गौर) को समर्पित है। यह पर्व सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए तथा अविवाहित कन्याओं द्वारा योग्य वर की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि “गण” का अर्थ शिव और “गौर” का अर्थ पार्वती है, इसलिए यह पर्व शिव-पार्वती के अटूट दांपत्य प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
उन्होंने बताया कि गणगौर उत्सव होली के दूसरे दिन से प्रारंभ होकर लगभग 16 दिनों तक चलता है। इस दौरान महिलाएं प्रतिदिन माता गौरी की पूजा करती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और मिट्टी या लकड़ी की प्रतिमाओं को सजाती हैं। अंतिम दिन शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में गणगौर प्रतिमाओं का विसर्जन करती हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया। विवाह के बाद माता पार्वती ने पृथ्वी पर आकर स्त्रियों को सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद दिया। तभी से महिलाएं गणगौर पर्व मनाकर माता गौरी से अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
संजय सर्राफ ने कहा कि गणगौर पर्व का मुख्य उद्देश्य वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करना है। यह पर्व नारी शक्ति, त्याग और धैर्य का प्रतीक होने के साथ-साथ सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का संदेश भी देता है। मारवाड़ी समाज में यह पर्व विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां लोकगीत, नृत्य और सामूहिक आयोजन इसकी गरिमा को और बढ़ाते हैं।
उन्होंने कहा कि गणगौर भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपराओं का प्रतीक है, जो हर वर्ष लोगों के जीवन में नई आशा, सुख और सौभाग्य लेकर आता है तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत को सशक्त बनाता है।
