Bokaro Missing Girl Case: जांच के आदेश में चार महीने की देरी पर हाई कोर्ट सख्त, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर उठाए सवाल
बोकारो की लापता 18 वर्षीय लड़की की हत्या के मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर जताई नाराजगी, पुलिस महानिदेशक ने वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच के दिए हैं आदेश
रांची: बोकारो की लापता लड़की की तलाश और कथित हत्या के मामले में पुलिस की लापरवाही की जांच शुरू करने में चार महीने की देरी पर झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ ने सवाल उठाया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए समय पर जांच का आदेश क्यों नहीं दिया गया। अदालत ने कहा कि इस देरी से सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़े होते हैं।
जनता का विश्वास बहाल करना सरकार की जिम्मेदारी
हाई कोर्ट ने कहा कि नागरिकों का सरकार और पुलिस व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए मामले की सच्चाई सामने लाना और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना जरूरी है। अदालत के अनुसार, ऐसे कदमों से ही जनता का भरोसा बहाल किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विंसेंट रोहित मार्की और शांतनु गुप्ता ने पक्ष रखा। वहीं, राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता रोहिताश्य राय अदालत में उपस्थित हुए।
जुलाई 2025 में लापता हुई थी 18 वर्षीय लड़की
मामला बोकारो जिले के पिंडराजोरा थाना क्षेत्र की 18 वर्षीय लड़की से जुड़ा है, जो जुलाई 2025 में लापता हो गई थी। परिजनों ने कई बार पुलिस से संपर्क किया, लेकिन लड़की का कोई सुराग नहीं मिला। इसके बाद उसकी मां ने न्याय की गुहार लगाते हुए झारखंड हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
अदालत के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर जंगल से लड़की का कंकाल बरामद किया। पुलिस के आरोप के अनुसार, लड़की के पूर्व प्रेमी ने उसकी हत्या की थी। अदालत ने बरामद अवशेषों और लड़की के माता-पिता के डीएनए का मिलान कराने का आदेश भी दिया था।
पिंडराजोरा थाने के 28 पुलिसकर्मियों पर लापरवाही के शुरुआती साक्ष्य
अदालत को बताया गया कि मामले की जांच में पिंडराजोरा थाने में तैनात सभी 28 पुलिसकर्मियों की ओर से कर्तव्य में लापरवाही के प्रारंभिक साक्ष्य मिले हैं। इसके बाद बोकारो के पुलिस अधीक्षक के आदेश पर संबंधित पुलिसकर्मियों को निलंबित करने का निर्णय लिया गया।
हालांकि, हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब लड़की का पता नहीं चल रहा था और उसके माता-पिता की शिकायत पर उचित कार्रवाई नहीं हो रही थी, तब जिले के पुलिस अधीक्षक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी क्या कर रहे थे। अदालत ने यह भी पूछा कि आरोपी की जल्द गिरफ्तारी के लिए प्रभावी निगरानी क्यों नहीं की गई और इस चूक के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी कैसे तय होगी।
25 जून को ही सरकार से मांगा था जवाब
हाई कोर्ट ने 25 जून 2026 को राज्य सरकार से पूछा था कि क्या बोकारो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की कथित लापरवाही की जांच कराई जाएगी। इसके बाद 3 अगस्त, 17 अगस्त और 17 सितंबर को भी सरकार की ओर से शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया।
अंततः 7 अक्टूबर 2026 को पुलिस महानिदेशक ने विशेष शाखा के पुलिस महानिरीक्षक को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कथित लापरवाही की व्यापक जांच का आदेश दिया। अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय के आदेश के करीब चार महीने बाद जांच का कदम उठाया जाना सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
चार सप्ताह में जांच की प्रगति पर मांगा शपथपत्र
राज्य सरकार ने अदालत से जांच पूरी करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा। हाई कोर्ट ने जांच की प्रगति के संबंध में शपथपत्र दाखिल करने का अवसर देते हुए मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।
