Home

गजब का जुनून, झमाझम बारिश में भी मांदर की थाप पर थिरकता रहा रांची…

Ranchi : रांची की सड़कों पर शनिवार का दिन कुछ अलग ही रहा। आसमान में घने बादल थे, बीच-बीच में तेज बारिश हो रही थी, लेकिन लोगों के चेहरों पर उत्साह की धूप साफ नजर आ रही थी। यह सरहुल का दिन था, जब प्रकृति और इंसान का रिश्ता सिर्फ महसूस नहीं, बल्कि जीया जाता है। सुबह से ही राजधानी पारंपरिक रंगों में रंगी दिखी। महिलाएं सफेद-लाल साड़ी में, पुरुष पारंपरिक पोशाक में, हर हाथ में साल का फूल और मांदर या ढोल की थाप… ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर एक ही लय में धड़क रहा हो। करमटोली स्थित आदिवासी कॉलेज छात्रावास परिसर में सरहुल महोत्सव का खास आयोजन हुआ, जहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी और विधायक कल्पना सोरेन के साथ पहुंचे। उन्होंने विधि-विधान से पूजा की और पूरे राज्य की खुशहाली की कामना की।

जब बारिश आई, पर जोश नहीं गया

दोपहर के बाद मौसम ने अचानक करवट ली। काले बादल छाए और देखते ही देखते तेज बारिश शुरू हो गई। कुछ देर के लिए ऐसा लगा कि शायद जुलूस और उत्सव का रंग फीका पड़ जाएगा। लेकिन यहां कहानी पलट गई। बारिश की बूंदें जैसे-जैसे तेज होती गईं, वैसे-वैसे लोगों का उत्साह भी बढ़ता गया। मांदर की थाप और तेज हो गई, कदम और खुलकर थिरकने लगे। सड़कों पर नाचते-गाते लोग यह बता रहे थे कि यह सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि पहचान है, जिसे कोई मौसम नहीं रोक सकता।

“भीगेंगे, लेकिन रुकेंगे नहीं”

जुलूस में शामिल एक युवक मुस्कुराते हुए कहता है, “सरहुल साल में एक बार आता है, बारिश तो होते रहती है। आज रुक गए तो क्या मजा।” वहीं पास में खड़ी एक बुजुर्ग महिला अपनी भीगी साड़ी संभालते हुए बोलीं, “हमारे पूर्वज भी ऐसे ही मनाते थे। प्रकृति का पर्व है, बारिश हो तो और अच्छा।” इन छोटी-छोटी बातों में ही इस पर्व का असली अर्थ छिपा है। यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक भावना है, जो हर हाल में जिंदा रहती है।

शहर बना एक बड़ा परिवार

रांची की सड़कों पर आज कोई अजनबी नहीं लगा। हर कोई एक-दूसरे के साथ था। डीजे की धुन हो या मांदर की आवाज, हर जगह एक ही एहसास था… अपनापन। बारिश में भीगते बच्चे, नाचते युवा और मुस्कुराते बुजुर्ग… हर चेहरा यही कह रहा था कि सरहुल सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि एक जश्न है, जिसमें पूरा समाज शामिल होता है।

प्रकृति से जुड़ने का सबसे सच्चा दिन

सरहुल हमें याद दिला गया कि हमारी जड़ें प्रकृति में ही हैं। पेड़, पानी और जमीन से जुड़ाव ही इस पर्व की असली आत्मा है। शायद यही वजह है कि जब बारिश हुई, तो किसी ने उसे रुकावट नहीं माना, बल्कि उसी का हिस्सा बनकर उसे अपनाया। रांची में इस बार सरहुल कि आस्था और हौसले के आगे मौसम भी छोटा पड़ गया। यहां लोग सिर्फ भीग नहीं रहे थे, बल्कि अपनी परंपरा, अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को पूरे दिल से जी रहे थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *