रांची विश्वविद्यालय में ‘साहित्य सृजन एवं वर्तमान परिदृश्य’ पर संगोष्ठी, विद्वानों ने रखे विचार — कहा, साहित्य समाज का दर्पण
रांची : रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में सोमवार को “साहित्य सृजन एवं वर्तमान परिदृश्य” विषय पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्य की प्रासंगिकता, सृजनशीलता और समकालीन समाज में उसकी भूमिका पर गहन विमर्श हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर, धनबाद के संस्थापक प्राचार्य डॉ. वासुदेव प्रसाद ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में विश्व-भारती शांति निकेतन के वरिष्ठ साहित्यकार एवं केंद्रीय विश्वविद्यालय, कोरापुट (ओडिशा) के पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) चक्रधर त्रिपाठी उपस्थित थे। उन्होंने कहा—
“साहित्य समाज का दर्पण है। सृजन तभी सार्थक बनता है जब वह मानवता और समय की पीड़ा को स्वर देता है।”
विषय-प्रवेश कराते हुए विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) जंगबहादुर पांडे ने कहा कि—
“हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संवेदना और संस्कृति की आत्मा है।”
विभागाध्यक्ष डॉ. हीरानंदन प्रसाद ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा—
“ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को साहित्य के जीवंत स्वरूप से जोड़ते हैं और सृजनात्मक दृष्टिकोण को गहराई प्रदान करते हैं।”
विशिष्ट अतिथि डॉ. सज्जन सर्राफ (जमशेदपुर टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज) ने कहा कि—
“संवेदना और विवेक का संतुलन ही सृजन को शाश्वत बनाता है।”
वहीं गवर्नमेंट टीचर्स’ ट्रेनिंग कॉलेज, कांके के डॉ. ओम प्रकाश ने कहा—
“साहित्य समाज को दिशा देने का कार्य करता है। युवा पीढ़ी को साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहिए।”
कार्यक्रम में विभाग के डॉ. सुनीता कुमारी, डॉ. सुनीता गुप्ता, डॉ. किरण तिवारी, लक्ष्मण प्रसाद, डॉ. अरुण कुमार सहित कई शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थियों ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन विभागाध्यक्ष डॉ. हीरानंदन प्रसाद ने किया। राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ।
