कारगिल विजय दिवस: जमशेदपुर के तीन पूर्व सैनिकों की शौर्यगाथा बनी युवाओं के लिए प्रेरणा

पूर्वी सिंहभूम, 26 जुलाई। कारगिल विजय दिवस भारतीय सेना की ऐतिहासिक जीत के साथ उन वीर सैनिकों के अदम्य साहस, त्याग और बलिदान को नमन करने का अवसर है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इस अवसर पर जमशेदपुर के तीन पूर्व सैनिक—भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी नवेंदु गांगुली, भारतीय थल सेना के पूर्व हवलदार बिरजू कुमार और बिहार रेजिमेंट के पूर्व हवलदार माणिक वारदा—की शौर्यगाथा युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
नौसेना में निभाई अहम जिम्मेदारियां
बिरसानगर निवासी नवेंदु गांगुली ने वर्ष 1989 में भारतीय नौसेना में भर्ती होकर अपने सैन्य जीवन की शुरुआत की। उन्होंने आईएनएस राणा और आईएनएस कुकरी जैसे युद्धपोतों पर नेविगेशन विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। श्रीलंका के निकट धनुषकोडी क्षेत्र में संचालित ऑपरेशन ताशा के दौरान समुद्री घुसपैठ रोकने और एलटीटीई की गतिविधियों पर निगरानी रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अलावा ऑपरेशन विजय के दौरान गुजरात तट की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में भी उन्होंने सक्रिय योगदान दिया।
नवेंदु गांगुली का कहना है कि देशभक्ति का वास्तविक अर्थ कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का पूरी ईमानदारी से निर्वहन करना है।
कारगिल की चोटियों पर दिखाया अदम्य साहस
गोविंदपुर निवासी पूर्व हवलदार बिरजू कुमार वर्ष 1995 में भारतीय सेना की एयर डिफेंस कोर में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने बर्फ से ढकी दुर्गम पहाड़ियों पर दुश्मन के खिलाफ अभियान में हिस्सा लिया।
उन्होंने बताया कि भीषण ठंड, ऑक्सीजन की कमी और लगातार हो रही गोलाबारी के बावजूद भारतीय सैनिकों का मनोबल कभी नहीं टूटा। कठिन संघर्ष के बाद भारतीय सेना ने एक-एक कर कई रणनीतिक चोटियों पर फिर से तिरंगा फहराया। उनके अनुसार, कारगिल विजय भारतीय सेना के साहस, अनुशासन और रणनीतिक कौशल का प्रतीक है।
18 घंटे बर्फ में दबे रहे, फिर भी नहीं टूटा हौसला
गदरा निवासी बिहार रेजिमेंट के पूर्व हवलदार माणिक वारदा की कहानी अद्वितीय साहस और जिजीविषा की मिसाल है। कारगिल युद्ध के दौरान पहाड़ी धंसने की घटना में वे करीब 18 घंटे तक बर्फ के नीचे दबे रहे। गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्हें अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवाने पड़े।
लंबे उपचार और कृत्रिम अंग लगने के बाद भी उनका हौसला नहीं टूटा। उन्होंने कहा कि एक सैनिक के लिए मातृभूमि की रक्षा से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता और भारतीय सेना हर चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। उनका संघर्ष और जज्बा आज भी युवाओं को राष्ट्रभक्ति, साहस और समर्पण की प्रेरणा देता है।
युवाओं के लिए प्रेरणादायी संदेश
कारगिल विजय दिवस के अवसर पर इन तीनों पूर्व सैनिकों की जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि देश की सुरक्षा केवल सीमाओं पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। उनके अनुभव और बलिदान नई पीढ़ी को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने तथा देशसेवा के लिए सदैव तत्पर रहने की प्रेरणा देते हैं।
