हॉकी झारखण्ड की वर्तमान समिति को भंग कर खिलाड़ियों का सम्मान बचाना सबसे जरूरी :बंधु तिर्की

रांची:झारखण्ड ने अपनी प्रतिभा, संघर्ष और अनुशासन के बल पर देश और दुनिया को अनेक उत्कृष्ट हॉकी खिलाड़ी दिये हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद यहाँ की बेटियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाया है. इसलिए हॉकी केवल एक खेल नहीं, बल्कि झारखण्ड की पहचान, स्वाभिमान और आदिवासी समाज के गौरव का प्रतीक है. ऐसे में हॉकी झारखण्ड में भ्रष्टाचार, पक्षपात, मनमानी और खिलाड़ियों के शोषण जैसे गंभीर आरोप सामने आना अत्यंत चिंताजनक है.
भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान असुंता लकड़ा द्वारा महिला खिलाड़ियों के शोषण, शिकायतों को दबाने, धमकी देने और प्रताड़ित करने जैसे आरोप केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं हैं. बल्कि पूरी खेल व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है. यदि एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी को न्याय के लिये सार्वजनिक रूप से आवाज उठानी पड़ रही है, तो ग्रामीण और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाली युवा खिलाड़ियों की स्थिति सहज ही समझी जा सकती है. दूसरी ओर, संबंधित पदाधिकारियों ने आरोपों से इनकार करते हुए निष्पक्ष जाँच की मांग की है. इसलिये आवश्यक है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के तथ्यों की निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच हो.
झारखण्ड की अधिकांश महिला हॉकी खिलाड़ी आदिवासी समाज से आती हैं. वे कठिन संघर्ष के बाद राज्य और देश का प्रतिनिधित्व करती हैं. उनके साथ किसी भी प्रकार का अन्याय केवल एक खिलाड़ी का नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के सम्मान का प्रश्न है. खेल संस्थाओं का उद्देश्य खिलाड़ियों को सुरक्षित वातावरण, समान अवसर और प्रोत्साहन देना है, न कि भय, दबाव और अपमान का माहौल बनाना.
यदि हॉकी झारखण्ड के किसी पदाधिकारी, कोच या जिम्मेदार व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगे हैं, तो उसकी उच्चस्तरीय, समयबद्ध और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिये और जाँच पूरी होने तक संबंधित व्यक्तियों को पद से अलग होकर सहयोग करना चाहिये ताकि जाँच की निष्पक्षता और संस्था की विश्वसनीयता बनी रहे.
19 जुलाई को प्रस्तावित हॉकी झारखण्ड के चुनाव से पहले इन गंभीर आरोपों की अनदेखी उचित नहीं होगी. केवल चुनाव करा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा. यदि प्रथम दृष्टया आरोपों में पर्याप्त आधार मिलता है, तो राज्य सरकार और खेल निदेशालय को हॉकी झारखण्ड की कार्यप्रणाली की व्यापक समीक्षा करनी चाहिये. आवश्यकता पड़ने पर वर्तमान समिति को भंग कर अंतरिम प्रशासक या नई निष्पक्ष व्यवस्था के माध्यम से खिलाड़ियों का विश्वास पुनः स्थापित किया जाना चाहिये.
लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि कुछ खेल संगठनों में सीमित लोग वर्षों तक पदों पर बने रहकर संस्थाओं को निजी जागीर की तरह संचालित करते हैं. इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और नई सोच प्रभावित होती है. खेल संगठन किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि खिलाड़ियों और खेल के विकास के लिए होते हैं.
मेरी स्पष्ट मान्यता है कि झारखण्ड के खिलाड़ियों का भविष्य किसी भी स्वार्थी, भ्रष्ट या शोषणकारी मानसिकता के हवाले नहीं किया जा सकता. साथ ही, किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना भी उचित नहीं है. लेकिन जब लगातार गंभीर शिकायतें सामने आएँ, तब सरकार और खेल प्रशासन का मौन रहना स्वीकार्य नहीं हो सकता.
आज आवश्यकता है कि हॉकी झारखण्ड सहित सभी खेल संघों में पारदर्शी चयन प्रक्रिया, महिला सुरक्षा तंत्र, स्वतंत्र शिकायत निवारण समिति, समयबद्ध जाँच व्यवस्था और खिलाड़ियों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित की जाये. पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों, महिला प्रतिनिधियों और अनुभवी खेल विशेषज्ञों को प्रशासनिक निर्णयों में उचित स्थान मिलना चाहिये.
मेरी जानकारी के अनुसार, केन्द्रीय खेल मंत्रालय ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए हॉकी इंडिया से आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) के माध्यम से जाँच कर रिपोर्ट देने को कहा है. मैं राज्य सरकार, खेल विभाग और संबंधित राष्ट्रीय संस्थाओं से आग्रह करता हूँ कि सभी आरोपों की निष्पक्ष जाँच करायी जाये. यदि जाँच में अनियमितता, दुर्व्यवहार या कदाचार सिद्ध होता है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करते हुए हॉकी झारखण्ड के पुनर्गठन पर गंभीरता से निर्णय लिया जाये.
झारखण्ड की सबसे बड़ी ताकत उसके खिलाड़ी हैं, न कि पदों से चिपके हुए पदाधिकारी. खिलाड़ियों का सम्मान ही खेल का सम्मान है. यदि खिलाड़ियों की गरिमा सुरक्षित नहीं रहेगी, तो कोई भी संस्था, पद या चुनाव खेल संस्कृति को नहीं बचा सकता. अब समय आ गया है कि झारखण्ड के खेल प्रशासन को पूरी तरह खिलाड़ियों के हित में पुनर्गठित किया जाये और यह स्पष्ट संदेश दिया जाये कि राज्य की किसी भी खिलाड़ी, विशेषकर आदिवासी बेटियों के सम्मान से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जायेगा.
