रांची

शॉक नहीं, माइक्रो करंट से इलाज : रिम्स में डिप्रेशन-डिमेंशिया मरीजों के लिए नई उम्मीद

रिम्स

Ranchi : रांची के रिम्स में अब हाई डिप्रेशन और डिमेंशिया से जूझ रहे मरीजों के लिए इलाज का नया तरीका शुरू हो गया है। साइकियाट्री विभाग में ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन (tDCS) मशीन मंगाई गई है। इस मशीन के जरिए मरीजों को बेहद हल्का माइक्रो करंट दिया जा रहा है, जिससे दिमाग की गतिविधियों को संतुलित करने में मदद मिलती है। डॉक्टरों का कहना है कि जिन मरीजों पर दवाइयों का असर सीमित हो रहा था, उन्हें इस नई तकनीक से फायदा मिल रहा है।

पहले शॉक थेरेपी, अब माइक्रो करंट

अब तक गंभीर डिप्रेशन के मरीजों का इलाज इलेक्ट्रो कंवल्सिव थेरेपी (ECT) यानी आम भाषा में शॉक थेरेपी से किया जाता था। इसमें एनेस्थीसिया देना पड़ता है और मरीज को भर्ती भी करना होता है। लेकिन tDCS एक नॉन-इनवेसिव तकनीक है। इसमें एनेस्थीसिया की जरूरत नहीं पड़ती और मरीज ओपीडी में ही इलाज कराकर घर जा सकता है।

क्या है TDCS तकनीक?

ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन यानी tDCS एक आधुनिक न्यूरोमॉड्यूलेशन तकनीक है। इसमें मरीज के सिर पर दो इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं- एक एनोड और एक कैथोड। एनोड दिमाग की गतिविधि को बढ़ाता है वहीँ कैथोड गतिविधि को कम करता है। इस तरह दिमाग के प्रभावित हिस्सों को संतुलित करने की कोशिश की जाती है। पूरी प्रक्रिया दर्द रहित होती है और कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाती है।

कम जोखिम, कम साइड इफेक्ट

विशेषज्ञों के मुताबिक ECT में दौरे आने की संभावना रहती है और रिकवरी में समय लगता है। वहीं tDCS में कम तीव्रता का करंट दिया जाता है, जिससे साइड इफेक्ट बहुत कम होते हैं। हालांकि जिन मरीजों के शरीर में मेटल इंप्लांट लगे होते हैं, उनके लिए यह तकनीक इस्तेमाल नहीं की जाती।

रोज 40-45 मरीज पहुंच रहे
रिम्स के साइकियाट्री विभाग
में रोजाना 40 से 45 मरीज इलाज के लिए आते हैं। इनमें से आधा दर्जन से ज्यादा मरीज हाई डिप्रेशन और डिमेंशिया के होते हैं। ऐसे मरीजों के लिए यह तकनीक उम्मीद की नई किरण बन रही है।

गढ़वा के मरीज में दिखा असर

गढ़वा जिले के एक मरीज पर इस तकनीक का सकारात्मक असर देखने को मिला। करीब 20 साल तक लापता रहने के बाद वह गंभीर मानसिक हालत में मिला था। शुरू में पारंपरिक इलाज से थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन tDCS शुरू होने के बाद उसने लोगों को पहचानना शुरू कर दिया। यहां तक कि वह अपनी पत्नी को भी पहचानने लगा। डॉक्टरों का कहना है कि यह बदलाव इस नई तकनीक की संभावनाओं को दिखाता है।

क्या कहते हैं विभागाध्यक्ष?

साइकियाट्री विभाग के एचओडी डॉ. अजय बाखला ने बताया कि अब शॉक थेरेपी के विकल्प के तौर पर माइक्रो करंट तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह तकनीक लकवा से उबर चुके मरीजों की अपंगता कम करने में भी मददगार साबित हो सकती है। कुल मिलाकर, रिम्स में शुरू हुई यह पहल मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा कदम मानी जा रही है। गंभीर अवसाद से जूझ रहे मरीजों के लिए यह इलाज नई उम्मीद लेकर आया है।

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