संघर्ष, बलिदान और पहचान का प्रतीक बना झामुमो का स्थापना दिवस
रांची/दुमका: आज का दिन राज्य सरकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के लिए विशेष और ऐतिहासिक महत्व रखता है। एक ओर सेरेंगसिया के अमर वीर शहीदों को राज्य सरकार की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित की गई, वहीं दूसरी ओर दुमका में झारखंड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस पूरे उत्साह और गौरव के साथ मनाया गया। यह दिन झारखंड के संघर्ष, बलिदान और आत्मसम्मान की जीवंत गाथा को एक बार फिर स्मरण कराने वाला रहा।
सेरेंगसिया की धरती उन वीर सपूतों की साक्षी रही है, जिन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इन अमर शहीदों को नमन करते हुए झारखंड के कोने-कोने से लोग उनके विचारों और आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं। यह संघर्ष केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी राज्य की चेतना और भविष्य की दिशा तय कर रहा है।
वीर शहीदों की इसी प्रेरणा से दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने झारखंडी समाज का नेतृत्व किया। उनके लंबे और अथक संघर्ष का परिणाम अलग झारखंड राज्य के रूप में सामने आया, जिसने आदिवासी, मूलवासी और वंचित समाज को पहचान और सम्मान दिलाया। भले ही वे आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी झारखंडवासियों के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
झारखंड की धरती ने अनगिनत ऐसे वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने पीढ़ियों की रक्षा और अधिकारों के लिए अत्याचारों को सहा। कोल विद्रोह से लेकर आज़ादी की लड़ाई तक आदिवासी समाज ने हर दौर में अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की। भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हु, चांद-भैरव, फूलो-झानो, खरसावां और गुवा के शहीदों की गाथाएं आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
जब देश आज़ादी का सपना भी नहीं देख रहा था, तब आदिवासी वीर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। यह झामुमो का स्थापना दिवस केवल एक राजनीतिक दल का उत्सव नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक लड़ाई का स्मरण है, जिसने झारखंड को उसकी अलग पहचान दिलाई।
आज के दिन शहीदों के सपनों का झारखंड बनाने का संकल्प लिया गया—ऐसा झारखंड जहां सम्मान, न्याय, समानता और अधिकार हर नागरिक तक पहुंचे। यही अमर शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और दिशोम गुरु शिबू सोरेन के विचारों को आगे बढ़ाने का मार्ग है।
