जब टेक्नोलॉजी और संवेदना मिलीं: 16 साल बाद घर लौटे रमेश गंजू
व्हाट्सएप नेटवर्क और सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल से संभव हुई एक बिछड़े परिवार की भावुक घर वापसी
रांची। आज के दौर में तकनीक को अक्सर गति, सुविधा और व्यापार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन जब तकनीक संवेदना के साथ जुड़ती है, तो वह इंसानी जिंदगी में चमत्कार भी कर सकती है। झारखंड के चतरा जिले के रहने वाले रमेश गंजू की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है, जो करीब 16 वर्षों बाद अपने परिवार से दोबारा मिल सके।
वर्ष 2010 में पारिवारिक विवाद के बाद चतरा जिले के बेंती गांव निवासी रमेश गंजू घर छोड़कर चले गए थे। उस समय उनकी पत्नी मुन्ना देवी और दो छोटे बेटे थे। परिवार ने उन्हें काफी खोजा, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला। समय के साथ परिवार की उम्मीदें भी धूमिल पड़ने लगीं।
मानसिक बीमारी और नशे की लत ने छीनी पहचान
परिवार को यह जानकारी नहीं थी कि घर छोड़ने के बाद रमेश गंभीर मानसिक बीमारी और नशे की लत के शिकार हो गए थे। वह वर्षों तक विभिन्न शहरों में एक बेघर और गुमनाम व्यक्ति की तरह भटकते रहे। समाज की भीड़ में उनकी पहचान कहीं खो गई थी।
चेन्नई में सामाजिक संस्था ने दिया सहारा
16 जून 2026 को चेन्नई के पूनामल्ली क्षेत्र में सामाजिक संस्था ‘उदवम करंगल’ के कार्यकर्ताओं ने रमेश को सड़क पर बेसहारा अवस्था में पाया। यह संस्था बेसहारा और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के पुनर्वास का कार्य करती है। स्थानीय पुलिस के सहयोग से संस्था ने रमेश को अपने मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया, जहां उन्हें उपचार, परामर्श, पौष्टिक भोजन और समुचित देखभाल उपलब्ध कराई गई।
व्हाट्सएप नेटवर्क बना परिवार से मिलने का जरिया
उपचार के दौरान रमेश की मानसिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। उन्होंने अपने अतीत से जुड़ी कुछ जानकारियां साझा कीं, जिसके आधार पर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पता लगाया कि वह झारखंड के रहने वाले हैं।
इसके बाद रमेश की तस्वीर और उनसे संबंधित जानकारी विभिन्न राज्यों के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के व्हाट्सएप समूहों में साझा की गई। यह संदेश अंततः कल्याणपुर स्थित एक दुकान तक पहुंचा, जो रमेश के गांव बेंती के निकट स्थित है। दुकानदार ने तस्वीर देखकर परिवार को इसकी सूचना दी।
एक ही शहर में थे पिता-पुत्र, लेकिन वर्षों तक नहीं हुई मुलाकात
सूचना मिलने के बाद रमेश की पत्नी मुन्ना देवी ने अपने बड़े बेटे नागेश्वर गंजू को इसकी जानकारी दी, जो चेन्नई के बाहरी इलाके में एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। नागेश्वर ने संस्था से संपर्क कर पुष्टि की कि तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति उनके पिता ही हैं।
सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह रहा कि नागेश्वर उसी पूनामल्ली क्षेत्र में रह रहे थे, जहां उनके पिता वर्षों से भटक रहे थे, लेकिन दोनों को एक-दूसरे की मौजूदगी की जानकारी तक नहीं थी।
16 वर्षों बाद हुआ भावुक मिलन
18 जून को पिता-पुत्र का लंबे इंतजार के बाद मिलन हुआ। नागेश्वर ने अपने पिता को तुरंत पहचान लिया और भावुक हो उठे। हालांकि, वर्षों से मानसिक बीमारी से जूझ रहे रमेश अपने ही बेटे को पहचान नहीं सके। यह घटना मानसिक बीमारी के गंभीर प्रभाव को भी उजागर करती है, जो व्यक्ति की स्मृति और पहचान दोनों को प्रभावित कर सकती है।
इलाज और देखभाल की दी गई सलाह
रमेश को घर भेजने से पहले पुनर्वास केंद्र की टीम ने परिवार को लगातार मानसिक उपचार और नियमित दवा के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि उचित उपचार, परिवार के सहयोग और समाज की संवेदनशीलता से ऐसे लोगों को सामान्य जीवन में वापस लाया जा सकता है।
रमेश गंजू की यह कहानी न केवल एक परिवार के पुनर्मिलन की दास्तां है, बल्कि यह भी बताती है कि तकनीक और मानवीय संवेदनाएं मिलकर किसी की खोई हुई पहचान और जिंदगी वापस लौटा सकती हैं।
