170वीं हूल दिवस पर आदिवासी छात्र संघ ने वीर महापुरुषों को श्रद्धांजलि अर्पित की, आंदोलन की महत्ता पर चर्चा
रांची: आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय अध्यक्ष सुशील उरांव के नेतृत्व में 170वीं हूल दिवस सोमवार को रांची के मोरहाबादी स्थित सिद्धो-कान्हो पार्क में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर बाबा सिद्धो और कान्हो की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया और झारखंड के वीर महापुरुषों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। साथ ही हूल क्रांति के शहीदों को याद करते हुए उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया गया।
केंद्रीय अध्यक्ष सुशील उरांव ने अपने संबोधन में कहा कि हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों की हुकूमत को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने हूल क्रांति के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई और उनके शासन को चुनौती दी। उरांव ने यह भी बताया कि हूल आंदोलन के जरिए जनजातीय समाज ने शोषण और असमानता के खिलाफ संघर्ष किया। इस आंदोलन ने अंग्रेजों के 200 साल के शासन को हिला दिया था और जनजातीय समाज ने जंगलों में रहते हुए अंग्रेजों से जंग लड़ी। उनका कहना था कि “मेरी जमीन, मेरा आसमान, और मेरी प्रकृति है, तो हम गोरे शासन को टैक्स क्यों दें?” यह आवाज उस समय के आदिवासी समाज का था, जो हमेशा अपने अधिकारों के लिए खड़ा रहा।
जिला अध्यक्ष राजू उरांव ने इस मौके पर कहा कि हूल के बाद अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई थी। उन्होंने इसे एशिया का सबसे बड़ा आंदोलन बताते हुए कहा कि शुरुआत में यह संघर्ष साहूकारों और महाजनों के खिलाफ था, लेकिन जैसे-जैसे अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ा, यह आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ भी हो गया। राजू उरांव ने कहा कि हूल आंदोलन ने यह साबित किया कि जनजातीय समाज हमेशा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता रहेगा।
डीएसपीएमयू इकाई के अध्यक्ष विवेक तिर्की ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को हूल आंदोलन की पूरी जानकारी देने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों में छात्रों को हूल आंदोलन के बारे में जानकारी दी जाती है, लेकिन यह जानकारी अधूरी होती है। विवेक तिर्की ने सुझाव दिया कि झारखंड के इतिहास में हूल आंदोलन को पूरी तरह से शामिल किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास और संघर्ष के बारे में सही जानकारी मिल सके।
कार्यक्रम में केंद्रीय मीडिया प्रभारी सुमित उरांव, रांची जिला अध्यक्ष राजू उरांव, डीएसपीएमयू इकाई अध्यक्ष विवेक तिर्की, अमित उरांव, छोटू उरांव, कर्मा उरांव, आनंद उरांव, प्रकाश उरांव, प्रदीप उरांव, पुष्पा उरांव, अनिकेत तिर्की सहित अन्य सदस्य भी उपस्थित थे। सभी ने एकजुट होकर यह संकल्प लिया कि हूल आंदोलन के इतिहास और उसके महत्व को संरक्षित और प्रचारित किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ी को इस संघर्ष और बलिदान का महत्व समझ में आए।
इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि हूल दिवस सिर्फ एक ऐतिहासिक दिन नहीं है, बल्कि यह हमें अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। आदिवासी समाज हमेशा से अपने सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष करता रहा है, और यह संघर्ष आज भी जारी है।
