पलामू

देहदान का संकल्प लेकर दुनिया से विदा हुए समाजसेवी रामकेश्वर मेहता, रिम्स में होगा पार्थिव शरीर का दान

पलामू, 23 अगस्त । शरीर नश्वर है, लेकिन समाज के लिए समर्पित जीवन अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ जाता है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देती है। पलामू जिले के हुसैनाबाद प्रखंड के दमदमी गांव निवासी करीब 70 वर्षीय समाजसेवी रामकेश्वर मेहता ने अपने जीवन में समाजहित के लिए संघर्ष किया और मृत्यु के बाद भी मानव सेवा का संकल्प निभाया। रविवार को उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप उनके पार्थिव शरीर को चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के एनाटॉमी विभाग को दान किया जाएगा।

रामकेश्वर मेहता ने जीवित रहते ही देहदान का संकल्प लिया था। इसके लिए उन्होंने बाकायदा शपथ पत्र देकर अपना शरीर चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के लिए समर्पित करने की इच्छा जताई थी। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार उनका जन्म 5 मार्च 1956 को हुआ था और उनके पिता का नाम मुनीश्वर महतो था। निधन के बाद परिजनों ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए पार्थिव शरीर को रिम्स ले जाने की तैयारी शुरू कर दी है।

अवैध उत्खनन के खिलाफ लंबे समय तक चलाया आंदोलन

रामकेश्वर मेहता सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़े हुए थे। दमदमी स्थित सोहेया पहाड़ बचाओ संघर्ष मोर्चा के वे अध्यक्ष थे। सोहेया पहाड़ को अवैध उत्खनन से बचाने के लिए उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया। ग्रामीणों और पर्यावरण के हित में उन्होंने 500 दिनों से अधिक समय तक धरना आंदोलन चलाया।

अवैध उत्खनन के खिलाफ उन्होंने कानूनी लड़ाई भी लड़ी और इस मामले को लेकर रांची उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। बताया जाता है कि इस मामले का अंतिम निष्पादन अभी लंबित है। पहाड़ और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के उनके प्रयासों ने उन्हें क्षेत्र में एक अलग पहचान दिलाई थी।

मृत्यु के बाद भी समाज के काम आने की इच्छा

रामकेश्वर मेहता का देहदान का निर्णय उनके सामाजिक जीवन की सोच का ही विस्तार माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवनकाल में समाज के लिए संघर्ष किया और मृत्यु के बाद भी उनका शरीर चिकित्सा विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी हो, यह संकल्प लिया।

उनके निधन की खबर से दमदमी गांव सहित पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है। ग्रामीणों का कहना है कि रामकेश्वर मेहता ने जीवनभर समाज के हित में आवाज उठाई। उन्होंने केवल अपने जीवन में ही लोगों की भलाई के लिए काम नहीं किया, बल्कि मृत्यु के बाद भी समाज के काम आने का रास्ता चुना।

उनका देहदान समाज को यह संदेश देता है कि जीवन की सार्थकता केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि समाज और मानवता के लिए योगदान देने में है। रामकेश्वर मेहता का पार्थिव शरीर रिम्स के एनाटॉमी विभाग में चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में उपयोग होगा, जबकि उनका सामाजिक संघर्ष और अंतिम संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उनका शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन होने से पहले चिकित्सा शिक्षा का माध्यम बनेगा, लेकिन मानव सेवा का उनका संकल्प लंबे समय तक समाज में जीवित रहेगा।-

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