जाति प्रमाणपत्र में पति का नाम होने पर चयन से वंचित अभ्यर्थी को हाई कोर्ट से राहत, JPSC को नियुक्ति की अनुशंसा का निर्देश
रांची, 17 अगस्त (हि.स.)। झारखंड हाई कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र में पिता के बजाय पति का नाम दर्ज होने के कारण अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग में चयन से वंचित चंचला कुमारी को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने उनकी रिट याचिका स्वीकार करते हुए झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति के लिए आवश्यक अनुशंसा करने का निर्देश दिया है। आयोग की अनुशंसा के बाद राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करना होगा।
सरकारी गलती की सजा अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती
अदालत ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति प्रमाणपत्र जारी करने में यदि गलती सरकारी अधिकारी की है, तो उसकी सजा अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती। प्रक्रिया संबंधी सरकारी त्रुटि किसी अभ्यर्थी के संवैधानिक आरक्षण अधिकार को खत्म करने का आधार नहीं बन सकती, खासकर तब जब अभ्यर्थी ने संबंधित आरक्षित श्रेणी में चयन के लिए निर्धारित अंक प्राप्त किए हों।
7वीं से 10वीं जेसीएस परीक्षा का मामला
मामला 7वीं से 10वीं झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2021 से जुड़ा है। जेपीएससी की विज्ञापन संख्या 01/2021 के तहत चंचला कुमारी ने परीक्षा में हिस्सा लिया था। उन्होंने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दस्तावेज सत्यापन और साक्षात्कार में भी भाग लिया।
दस्तावेज सत्यापन के दौरान उन्होंने 27 मार्च 2019 को जारी जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था। इस प्रमाणपत्र में पिता के स्थान पर पति का नाम दर्ज था। बाद में जेपीएससी के निर्देश पर उन्होंने 9 मई 2022 को पिता के नाम के आधार पर जारी दूसरा जाति प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया।
इसके बावजूद 31 मई 2022 को जारी परीक्षा परिणाम में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
590 अंक के बावजूद नहीं हुआ चयन
मार्क्स स्टेटमेंट में उनके आवेदन को अस्वीकार करने का कारण बताया गया कि उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा में एससी श्रेणी का लाभ लिया था, जबकि अपलोड किया गया जाति प्रमाणपत्र पति के आधार पर जारी हुआ था।
हालांकि, चंचला कुमारी ने कुल 590 अंक हासिल किए थे, जबकि एससी श्रेणी का कटऑफ 583 अंक था। उनका प्राप्तांक अंतिम चयनित एससी अभ्यर्थी के अंक से भी अधिक था।
प्रमाणपत्र जारी करने में अधिकारी की गलती
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आया कि चंचला ने जाति प्रमाणपत्र के लिए 4 जनवरी 2019 को आवेदन किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 25 फरवरी 2019 को अधिकारियों को जाति प्रमाणपत्र पिता के नाम के आधार पर जारी करने संबंधी निर्देश दिया था।
हालांकि, अदालत ने पाया कि चंचला का आवेदन इस निर्देश से पहले ही दिया जा चुका था। इसके बावजूद कोडरमा के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) ने 27 मार्च 2019 को पति के नाम के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया था।
अदालत ने माना कि यदि सरकारी अधिकारियों की ओर से प्रक्रिया में कोई गलती हुई है, तो उसका खामियाजा अभ्यर्थी को नहीं भुगतना चाहिए।
सरकारी पत्र को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
अदालत ने यह भी पाया कि 25 फरवरी 2019 का सरकारी पत्र न तो राजपत्र में प्रकाशित हुआ था और न ही उसे कानून, नियम, विनियम, अधिसूचना अथवा सरकारी संकल्प का वैधानिक दर्जा प्राप्त था।
ऐसे में केवल उस पत्र के आधार पर बाद में जारी जाति प्रमाणपत्र को अमान्य नहीं माना जा सकता।
दोनों प्रमाणपत्रों में जाति और पता समान
अदालत ने 27 मार्च 2019 और 9 मई 2022 को जारी दोनों जाति प्रमाणपत्रों की तुलना की। दोनों में चंचला कुमारी का स्थायी पता और जाति समान पाई गई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला नहीं था, जिसमें विवाह के बाद किसी महिला ने पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास किया हो। बाद के प्रमाणपत्र में केवल पति के स्थान पर पिता का नाम दर्ज किया गया था, जबकि जाति और स्थायी निवास में कोई बदलाव नहीं हुआ था।
JPSC की दलील कोर्ट ने नहीं मानी
सुनवाई के दौरान जेपीएससी की ओर से दलील दी गई कि आवेदन के समय पिता के नाम वाला जाति प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था और बाद में नया प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना विज्ञापन की शर्तों में बदलाव के समान होगा।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जेपीएससी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि 27 मार्च 2019 का जाति प्रमाणपत्र गलत प्रारूप में था या सक्षम अधिकारी ने उसे जारी नहीं किया था।
प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी यानी एसडीओ द्वारा जारी किया गया था और वह विज्ञापन में निर्धारित प्रारूप से भी मेल खाता था। अदालत ने यह भी गौर किया कि विज्ञापन के प्रोफॉर्मा-IV में पिता के साथ पति का नाम दर्ज करने की व्यवस्था भी मौजूद थी।
आरक्षण के संवैधानिक अधिकार पर अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाणपत्र किसी व्यक्ति की पहले से मौजूद जातिगत स्थिति का प्रमाण होता है। प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में ऐसी त्रुटि, जो अभ्यर्थी की वजह से नहीं हुई हो, उसके संवैधानिक आरक्षण अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती।
अब 12 सप्ताह में पूरी करनी होगी प्रक्रिया
हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब जेपीएससी को आठ सप्ताह के भीतर चंचला कुमारी की नियुक्ति की अनुशंसा करनी होगी। इसके बाद राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करना होगा।
इस फैसले को उन अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में हुई सरकारी या प्रशासनिक त्रुटियों के कारण चयन प्रक्रिया में नुकसान उठाना पड़ता है।
