16 जुलाई को निकलेगी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, आस्था, समरसता और लोकमंगल का महापर्व : संजय सर्राफ
रांची, 14 जुलाई: विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भगवान श्री जगन्नाथ की रथ यात्रा सनातन धर्म के प्रमुख और सबसे पवित्र उत्सवों में से एक है। इस वर्ष रथ यात्रा 16 जुलाई (गुरुवार) को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के अवसर पर निकाली जाएगी। उन्होंने कहा कि यह पर्व आस्था, सामाजिक समरसता, सेवा और लोककल्याण का संदेश देने वाला महापर्व है।
संजय सर्राफ ने बताया कि ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्वविख्यात है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। इस दिव्य आयोजन में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होकर प्रभु के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
उन्होंने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने एक बार अपने दोनों भाइयों के साथ नगर भ्रमण की इच्छा व्यक्त की थी। बहन की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण (जगन्नाथ) और बलराम रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले। इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष रथ यात्रा निकाली जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह यात्रा भगवान जगन्नाथ के अपनी मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर जाने का प्रतीक है, जहां वे कुछ दिनों तक विश्राम करने के बाद पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं।
उन्होंने कहा कि रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवता का भी महान संदेश देती है। इस दिन जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र की सभी सीमाएं समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। यह संदेश देता है कि ईश्वर सभी के हैं और उनके द्वार हर व्यक्ति के लिए समान रूप से खुले हैं।
संजय सर्राफ ने बताया कि इस महापर्व की विशेष पहचान भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और माता सुभद्रा का दर्पदलन रथ है। इन तीनों रथों का निर्माण प्रत्येक वर्ष नई लकड़ियों से पारंपरिक विधि के अनुसार किया जाता है। श्रद्धालु रथ की रस्सी खींचकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक रथ खींचने और भगवान के दर्शन करने से पुण्य, सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि रथ यात्रा का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि सेवा, समानता, भक्ति, लोककल्याण और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देना है। यह पर्व प्रेम, करुणा, सहयोग और सद्भाव के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान जगन्नाथ का अर्थ ही ‘जगत के नाथ’ अर्थात संपूर्ण विश्व के स्वामी है। इसलिए यह महापर्व विश्वबंधुत्व और संपूर्ण मानवता के कल्याण का प्रतीक माना जाता है।
संजय सर्राफ ने कहा कि आज भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के विभिन्न राज्यों और दुनिया के कई देशों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, लोक आस्था और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि रथ यात्रा का संदेश है कि जब ईश्वर स्वयं अपने भक्तों के द्वार तक आते हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति को भी प्रेम, सेवा और मानव कल्याण के मार्ग पर चलकर समाज में सुख, शांति और सद्भाव स्थापित करने का संकल्प लेना चाहिए।
