निर्जला एकादशी 25 जून को, सभी एकादशियों का पुण्य प्रदान करने वाला महान व्रत
भगवान विष्णु की आराधना, आत्मसंयम, सेवा और दान का महापर्व : संजय सर्राफ
रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना गया है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली निर्जला एकादशी, जिसे भीमसेनी एकादशी अथवा पांडव एकादशी भी कहा जाता है, इस वर्ष 25 जून, गुरुवार को मनाई जाएगी।
उन्होंने कहा कि यह एकादशी भगवान विष्णु की आराधना, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करने से वर्षभर की चौबीस एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
महाभारत काल से जुड़ी है व्रत की कथा
संजय सर्राफ ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों में सबसे बलशाली भीमसेन अत्यधिक भूख के कारण प्रत्येक एकादशी का व्रत नहीं रख पाते थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए व्रत रखने की सलाह दी। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया, जिसके कारण यह व्रत भीमसेनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व
निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा में फल, पुष्प, तुलसीदल, धूप, दीप एवं नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। व्रती दिनभर निराहार एवं निर्जल रहकर भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते हैं तथा अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करते हैं।
दान-पुण्य का भी है विशेष महत्व
उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी को अत्यंत कठिन एवं श्रेष्ठ व्रतों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसके प्रभाव से पापों का नाश होता है, जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
इस दिन जल से भरे घड़े, पंखे, वस्त्र, फल, शरबत तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। भीषण गर्मी के समय प्यासे एवं जरूरतमंद लोगों को शीतल जल उपलब्ध कराना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
संयम और परोपकार का संदेश देता है महापर्व
संजय सर्राफ ने कहा कि निर्जला एकादशी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संयम, सेवा, दान और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देने वाला महापर्व है। यह व्रत मनुष्य को भक्ति, सदाचार और परोपकार की भावना से जोड़कर जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है तथा समाज में सेवा और मानवता के मूल्यों को मजबूत बनाता है।
