वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा हैं रानी लक्ष्मीबाई : संजय सर्राफ
रांची, 16 जून। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम अदम्य साहस, राष्ट्रभक्ति और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष तथा झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ ने रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस की पूर्व संध्या पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह बातें कही।
उन्होंने कहा कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस प्रतिवर्ष 18 जून को मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1858 में उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध युद्ध करते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनका बलिदान भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में से एक माना जाता है।
संजय सर्राफ ने बताया कि महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘मनु’ कहा जाता था। विवाह के बाद वे झांसी की महारानी बनीं। जब अंग्रेजों ने अपनी हड़प नीति के तहत झांसी को अधीन करने का प्रयास किया, तब रानी लक्ष्मीबाई ने उसका डटकर विरोध किया।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया और वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। 18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटा-की-सराय में अंग्रेजी सेना से युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं। अंतिम क्षण तक उन्होंने अपने अद्वितीय साहस और रणकौशल का परिचय दिया।
संजय सर्राफ ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई का प्रसिद्ध कथन “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी” आज भी देशभक्ति और स्वाभिमान की भावना को प्रज्ज्वलित करता है। उनका जीवन नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, साहस, आत्मसम्मान और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं तथा विभिन्न संगठनों द्वारा इस अवसर पर संगोष्ठियों, निबंध प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन किया जाता है। रानी लक्ष्मीबाई भारतीय नारी शक्ति की महान पहचान हैं। उनका संघर्ष यह सिद्ध करता है कि दृढ़ संकल्प, साहस और देशभक्ति के बल पर किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है।
संजय सर्राफ ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।
